शंखनाद

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

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कुमार गौरव अजीतेन्दु


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दो रंग – लघुकथा

Posted On: 21 Sep, 2012  
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निरा बेवकूफ (कहानी)

Posted On: 18 Sep, 2012  
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समाज सुधारक

Posted On: 14 Sep, 2012  
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मेघ…संग ले चल मुझे भी

Posted On: 10 Sep, 2012  
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नेशनल विलेन : श्री राजासाहेब ठाकरे ?

Posted On: 3 Sep, 2012  
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सड़क बुलाती है

Posted On: 28 Aug, 2012  
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दोहे : गुरुकृपा

Posted On: 16 Aug, 2012  
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चन्द्रमा

Posted On: 11 Aug, 2012  
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Others न्यूज़ बर्थ मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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वो बच्चा…

Posted On: 8 Aug, 2012  
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Others न्यूज़ बर्थ पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय अजीतेंदु जी, आप ने मेरे मन की बात उठाई है और मेरे-अपने जैसे अनेक लोगों के भीतर उठ रहे प्रश्न को उजागर किया है | पर तथ्य यह है कि हमारे देश में सब कुछ जैसे कि तम्बाकू-गाँजा-भाँग-शराब-चरस-कोकीन-हेरोइन आदि और समाज को विकृत करने वाली अन्य तमाम विकारक वस्तुओं-कुसंस्कारों को धड़ल्ले से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से चलने-चलाने की छूट होती है और फिर उनके विरोध में अनेक खर्चीले सरकारी-गैर सरकारी दिखावे के अभियान चलाये जाते हैं, रेडियो-टीवी पर भी ‘डिशकशन’ ख़ूब देखने-सुनने को मिलता है | भोजपुरी गानों की अश्लीसता निश्चित ही बिहार की आज-कल की नग्न होती भोंडी मानसिकता है, जो खुले मैदान में बेशर्मी से सेक्स के लिए उतारू औरत-मर्द के भीतर छिपे साँड़-साँड़नी के रूपक के रूप में अक्सर सुनने को मिलता है | पता नहीं ‘सेंसर’ नाम की चीज हमारे देश में किस कोने में अस्तित्व ग्रहण करती है ? वह है भी कहीं या नहीं, कौन जाने ! और समाज ? वह तो मन ही मन, मौन हो, खुद ही चटकारे लेने में मग्न है | मीडिया अब चौबीसों घंटे टीआरपी के रेस में जुटी रहती है | वह न्यूज की सरगर्मी भाँप कर फायदे-नुकसान के हिसाब से न्यूज उठाती-बनाती है | इक्के-दुक्के हम जैसों की आवाज नक्क्रार खाने में तूती की आवाज से अधिक कुछ नहीं | फिर भी आप की चिंता बहुत ही जायज है, इस अपेक्षित आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

जब अंग्रेज गये तो एक बडा कागज ले के भारत का नकशा बनाने बैठ गई कुछ वकिल की टोली । सरदार पटेलने एक एक कर के सब राज्यों का सिक्का उस कागज पर मार दिया । ये टोली नकशा बनाने के बदले एक एक नेता को बुला कर सिक्कावाला भाग फाड फाड कर बांटने लगी । "जा, तू दो महिना जेलमें रहा था, ले जा ये तेरा कागज । " लल्लु को, पंजु को, सब को एक एक टुकडा दे दिया । नकशे के लिए कुछ बचा नही । नकशा तो बनाना था । सब टुकडों के पिछे सेलो टेप लगाया, हो गया "मेरा भारत महान " लल्लु और पंजु अपने हिसाब से अपने टुकडे पर लिखने लगे । उन में रही जनता वोही पढने लगी जो लल्लु पंजुने लिखा । अब लल्लु की जनता को पंजु की बात समज में नही आती, पंजु की जनता को लल्लु की । लल्लु,पंजु और उन की जनता को मालुम ही नही वो वकिलों की टोली की औलादें पिछे सेलोटेप में क्या क्या लिख रही हैं । कितने घोटाले कर रही हैं । जनता को अक्कल ही नही है । समजती ही नही है । लल्लु पंजु को कहा गया है थोडे दिन उखाड लो अपने अपने टुकडे को, सेलोटेप में लिखने में थोडी गरबड हो गई है । सुधार लें, बादमे चिपका देना । उखडे हुए टुकडे के उखडे लोग गालिप्रदान कर रहे हैं । सेलो टेप बाले कोयले की लिखावट बदल रहे हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

मानवता के नाम पर चलनेवाले गोरखधंधे में सब कुछ होता है| दानवता का नंगा नाच देखना हो तो उन लोगों को देखिये जिन्होंने धर्म को त्याग दिया है| ऐसे लोग खुलेआम आधुनिकता की अंधी दौड़ का समर्थन करते मिलेंगे| उनके लिए प्रेम महज एक वासनापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं| शीलता को छोड़ के भौंडेपन का प्रचार भी यही मानवतावादी करते हैं| मर्यादाहीनता को निजी मामला बताना हो अथवा हिंसा के प्रति दोहरा रवैया, सब इन्हीं कथित मानवतावादियों की देन है| नशीली वस्तुओं यथा शराब, ड्रग्स आदि इनके लिए मनोरंजन के साधन मात्र हैं| दूसरों को स्वार्थ से दूर रहने की शिक्षा देने वाले ये लोग स्वार्थ में आकंठ डूबे रहते हैं| आज अगर छीनने की भावना बढ़ी है तो इसका कारण यही मानवतावादी हैं जो अपनेआप को सफलता के उस शिखर पर देखना चाहते हैं जहाँ कोई और न पहुंचा हो| सार्थक लेखन ! कुमार साब

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रिय आनंद जी, बिलकुल सही कहना है आपका......इन नेताओं की नीयत ही यही होती है की एक-दूसरे पर आरोप डाल के मामले को उलझा दें और दोनों का ही काम चलता रहे........कई गंभीर मामलों जैसे "भोपाल गैस कांड" में भी यही हुआ.......उस समय केंद्र और राज्य दोनों जगह कांग्रेस की ही सरकार थी.....लेकिन बाद में जब एंडरसन को भगाने के दोषी की खोज हुई तो तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री के समर्थकों ने तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री पर और तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री के समर्थकों ने तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री पर आरोप लगाने शुरू कर दिए.....मामला हमेशा की तरह उलझ गया और बात दब गई.......ऐसे नेताओं का क्या किया जाये समझ नहीं आता......और हाँ, ये बिलकुल भी मत सोचियेगा की मैं आपको भूल गया........इस बारे में आपको ई-मेल भी कर चुका हूँ....आजकल जागरण पर आना ही थोडा कम हो गया है......

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

आदरणीय संतोष जी सादर प्रणाम आपसे ऐसी ही उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया की उम्मीद थी| मुझे मालूम है आप इस मंच पर मौजूद उन राष्ट्रवादी लोगों में हैं जिनके विचार स्वस्थ हैं| संतोष जी, दरअसल स्वामी जी का विरोध करना या समर्थन करना मुद्दा नहीं है| असली मुद्दा ये है कि क्या हम सचमुच देश को भ्रष्टाचारमुक्त करना चाहते हैं या नहीं? सचमुच हम चाहते हैं या नहीं कि कालाधन देश में वापस आये? अगर हमारा जवाब हाँ है तो स्वामी जी का विरोध क्यों? सिर्फ इसलिए कि वो एक हिन्दू संत हैं? अगर ऐसा है तो बाबा के विरोधी तो देश के लिए बेहद घातक सिद्ध हो सकते हैं| मेरे मन में स्वामी जी के लिए सम्मान है अतः मैंने ये कविता लिखी| आपके समर्थन के लिए आभार.......

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

कुमार गौरव जी ,.सादर नमस्कार आपकी भावनाओं को सलाम करता हूँ ,.. संतयोद्धा आप जैसे सदियों में होते हैं बीज दिलों में जो देशभक्ति के बोते हैं, आप अकेले नहीं हम हमेशा साथ हैं एक इशारे की प्रतीक्षा में करोड़ों हाथ हैं|...... यह करोड़ों हाथ एक दिन हिन्दुस्तान को बदल कर रहेंगे ,..और इनको खड़ा करने में स्वामीजी की महानता है ,..कुछ लोग जो उनके साथ विवाद खड़ा करना चाहते हैं वो उनकी भावनाओ को समझने का प्रयत्न करें ...जिस व्यक्ति ने अपने पुरुषार्थ और पसीने से स्वदेशी साम्राज्य खड़ा किया और उस साम्राज्य को देश के लिए सहर्ष मिटाने को तैयार हैं ,..निःसंदेह घने अंधियारे में यह किरण भारत के आकाश पर सूर्य चमकाएगी ....सुन्दर भावनात्मक रचना के लिए पुनः आभार और बधाई ...सादर

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

गौरव जी, कमल पानी में जन्म भले लेता है. किन्तु फिर भी अपने ऊपर पानी को टिकने नहीं देता है. रत्नगर्भा वसुंधरा की मिट्टी में पाया जाने वाला हीरा चाहे कितनी भी काली मिट्टी में दबा कर रखें, बाहर आते ही वह फिर चमकने लगता है. चाहे सूरज के ऊपर कीतनी भी काली घटा छा जाए, अन्धेरा भले होगा, रात नहीं. सत्य-असत्य के स्वोपार्जित परिभाषा से चाहे हिन्दू धर्म को कितना भी ढोंग और पाखण्ड प्रमाणित करने का प्रयत्न किया जाय, वह इन सब को विदीर्ण कर शीर्षस्थ हो जाएगा. आप चिंता न कीजिये, आसमान पर थूका अपने मुंह पर ही आता है. जिसने भी हिन्दू धर्म का विरोध कर सामाजिक उत्थान का वीणा उठाया वह भूसी के धुवें के समान अंतरिक्ष में विलीन हो गया. वैसे भी आप की बातो का जबाब तो है. बहुत जबाब है, किन्तु तार्किक एवं प्रामाणिक नहीं. क्योकि धर्म एक ठोस, तार्किक विचार, सत्य एवं पूर्णता के अभेद्य चहार दिवारी से घिरा है जिस पर चाहे कितना भी वार किया जाय, वह बिंधने वाला नहीं. संत न छोड़े संतई कोटिक मिले असंत. मलय भुवंगहि बेधिया शीतलता न तजंत.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

दिनेश जी नमस्कार मैंने वो साबित कर दिया जो मैं साबित करना चाहता था| आपकी लिखी एक पंक्ति - "विज्ञान और इंटरनेट के दुरुपयोग का कारण बौद्धिक विकार है, इसके लिये इन्हें नकारने की आवश्यकता नहीं है।" सिर्फ इस एक पंक्ति ने मेरी विचारधारा को सही सिद्ध कर दिया| यही बात मैं आपके मुंह से सुनना चाहता था| मैं आपसे यही कहना चाहता था कि मनुष्य अपनी स्वार्थपूर्ण सोच और कुंठित बुद्धि के कारण गलतियाँ करता है और उसे तरह-तरह की आड़ लेकर छुपाता है| कभी धर्म का, कभी विज्ञान का तो कभी सामाजिक स्थितियों का| अगर विरोध ही करना है तो विरोध मनुष्य के अन्दर छिपे खुराफाती दिमाग का करना चाहिए न कि धर्म, विज्ञान या सामाजिक स्थितियों का| आपने बिलकुल सही कहा मैं उम्र में आपसे आधा ही पडूंगा| आधा ही क्यों, हो सकता है उससे भी कम| आपने अपने विवाह की जो तिथि अपने ब्लॉग में बताई है, उस समय तक मैंने ठीक से चलना भी नहीं सीखा था और शायद आपकी उम्र का लिहाज ही वो कारण था जो मुझे आपसे बहस करने से रोक रहा था| ये मेरा स्वभाव है लेकिन आप मुझे उकसाते रहे| मुझे मजबूर करते रहे कि मैं आपको जवाब दूँ| मैं अपने से बड़ों की इज्जत जरूर करता हूँ लेकिन कायर बिलकुल भी नहीं हूँ| मैंने आपपर कोई भी व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की| मेरी सभी टिप्पणियां विषयानुकूल थीं| वो भाई-बहन के विवाह से सम्बंधित जो प्रश्न मैंने आपसे पूछा था वो आपको ये दिखाने के लिए कि कानून और धर्म में मौलिक अंतर क्या होता है| कानून जहाँ लोगों को सिर्फ कानूनी दृष्टि से देखता है वहीँ हमारा हिन्दू धर्म लोगों को मानवीय दृष्टि से देखता है| हमारा हिन्दू धर्म ही हमें बताता है कि रिश्तों की मर्यादा क्या होती है| मेरे सभी प्रश्न सीधे थे और उसी विषय से जुड़े थे जिन पर हमारी चर्चा चल रही थी| मुझे अच्छी तरह से मालूम था कि आप अगर मेरे इन प्रश्नों के सटीक जवाब दे देंगे तो मेरी कही हुई बातें स्वतः ही सिद्ध हो जाएँगी| और हुआ भी ठीक वैसा ही| आप मेरे बिछाए जाल में फंस गए और खुद ही स्वीकार कर लिया कि - "स्वार्थ मानव का स्वाभाविक गुण है। इसके बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है। स्वार्थ उसकी पहचान है। स्वार्थ का जन्म आवश्यकताओं की अधिकता एवं बुद्धि के विकास के कारण हुआ।" मनुष्य की इसी स्वार्थी बुद्धि के बारे में मैं आपको बताना चाहता था जिसके कारण ये दुनिया नरक बनी हुई है| मनुष्य अगर आज मनुष्य का ही शत्रु बना हुआ है तो इसके पीछे एकमात्र वजह मनुष्य की ये स्वार्थी बुद्धि ही है| एक हिन्दू होने के नाते आपके कई लेखों ने मेरी भावना को आहत किया परन्तु मैंने आपसे वाद-विवाद करना उचित नहीं समझा क्योंकि हमारे देश में आप जैसे लोगों की कोई कमी नहीं है| जिनके लिए हिन्दुओं की भावनाओं का कोई मूल्य नहीं| अंधविश्वासों का मैं स्वयं विरोधी हूँ परन्तु अंधविश्वासों की आड़ लेकर कोई मेरे हिन्दू धर्म पर प्रहार करे ये मुझे बिलकुल पसंद नहीं| दिनेश जी, उम्र की एक मर्यादा होती है| अगर आप खुद से छोटी उम्र के लोगों से यूँ ही वाद-विवाद करते रहेंगे तो ये आपको शोभा नहीं देता| आपकी यही आदत मैं इस मंच पर पहले भी देख चुका हूँ जब इससे पहले हुए कुछ अन्य विवादों में (जिनमें मैं शामिल नहीं था) भी आप अपनी उपस्थिति नाहक ही दर्ज करा रहे थे| आप मुझसे धर्म के विषय पर हो रही इस चर्चा के दौरान अपनी बातों को मीठे-मीठे शब्दों की चाशनी में लपेट कर पेश करते रहे| आप ये भूल गए कि चाशनी में कीट-पतंगे फंसते हैं, अजगर नहीं| अपनी बात को सिद्ध करते-करते आप मेरी ही बातों को सिद्ध कर बैठे| मेरी आपसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है| आप कोई रचनात्मक लेख लिखते हैं तो मैं उसका स्वागत करूँगा लेकिन हिन्दू धर्म को ही अप्रासंगिक साबित करते हुए लिखे गए आपके किसी भी लेख को मैं हर्गिज समर्थन नहीं दूंगा| इसके साथ ही इस चर्चा को यहीं विराम देता हूँ| पूर्ण विराम| अतः अब पुनः इसी विषय पर चर्चा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

आदरणीय  गौरव जी आप  किसी विचार को व्यक्तिगत लेकर, व्यक्तिगत  टिप्पणी करने लगते हैं। जो वैचारिक  दृष्टि से उचित नहीं। वैचारिक  विमर्श  तथा वाद  विवाद  का अर्थ  व्यक्तिगत संघर्ष नहीं होता। जैसा कि आप  करते हैं। मैं जो भी प्रतिक्रिया देता हूँ, वह किसा को नीचा दिखाने के लिये नहीं और न ही अपने को सही या उच्च साबित करने  के लिये होती है। जैसा कि आप करते या समझते हैं। प्रचीन काल  से वैचारिक  विमर्श  के कारण  ही आज  मानवीय समाज सफलता के उच्च सोपान पर पहुँचा है। सच  क्या है यह जानने के  लिये ही में प्रतिक्रियायें देता हूँ। इसे  मैं खेल  की तरह हार जीत में नहीं देखता। जैसा कि आप समझते हैं। मेरी उम्र  आपसे दुगनी तो  होगी ही, लेकिन मैं आपने आपको आपसे, आप से क्या सभी से छोटा  समझता हूँ। और छोटा बनकर जी जीवन जीने में विश्वास  रखता हूँ।  मैं न तो वाहवाही के लिये लिखता हूँ और न ही सम्मान के लिये। शायद आपको इसमें अतिश्योति लगे। लगना भी स्वाभाविक  है। क्योंकि साधारणतः ऐसा संभव नहीं है। लेकिन जो है तो है।  आपका उद्देश्य क्या है यह तो आप  ही बेहतर जानते होंगें। आपने मेरे किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, क्योंकि आप मेरे किसी उत्तर देने  के  लिये बाध्य नहीं हो। किन्तु ज्ञान  पिपासा की अधिकता के कारण  मैं आपके प्रत्येक  प्रश्न का उत्तर देने के लिये बाध्य हूँ। मैं आपको न तो नीचा दिखाने के लिये प्रतिक्रिया लिखता हूँ और न ही आप को दुखी करने के लिये। मेरा मानना है कि किसी का हृदय दुखना किसी पशु, पक्षी या मनुष्य की हिंसा से कम  पाप नहीं है। इस  बारे में आप क्या सोचते हैं यह तो आप ही जातने होगे। मुझे ऐसा लगा कि मेरी प्रतिक्रियाओं से आपका हृदय दुखी हुआ  । अतः मैने आपके ब्लॉग पर आपर अपने विचारानुसार प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। क्योंकि मेरा मानवीय धर्म   इसकी इजाजत  नहीं देता हाँ मेरा हिन्दु सम्प्रदाय  इसके बारे में खामोश  है। अगर मेरे किसी वक्तव्य से आपके हृदय को आघात पहुँचा हो तो उसके लिये क्षमा चाहता हूँ। यदि आप मेरी प्रतिक्रिया को व्यक्तिगत  न लें तो आपके प्रश्नों का उत्तर  दे सकता हूँ। मैं किसी पुस्तक  या व्यक्ति या महापुरुष  का अंधा भक्त नहीं हूँ। मैं सभी  का प्रशंसक  और सभी का आलोचक  हूँ। यही विरोधाभास  मेरी पहचान है। आस्तिक  आया मंच  पर, करने को ये सैर। सबसे मेरी दोस्ती सबसे मेरा बैर।। आपके प्रथम  प्रश्न का उत्तर मेरे आलेख  ईश्वर धर्म  और  विज्ञान में मिल जायगा। स्वार्थ  मानव का स्वाभाविक  गुण  है। इसके बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है।  स्वार्थ  उसकी पहचान है। स्वार्थ  का जन्म  आवश्यकताओं की अधिकता एवं बुद्धि के विकास  के कारण  हुआ। भाई बहिन या माँ या पिता के साथ  विवाह न तो व्याभारिक  है और न ही नैतिक  धर्म  क्या कहता है यह मझसे अधिक  आप जानते होंगे। किन्तु इस  तरह का प्रश्न मुझसे पूँछने का औचित्य मेरी समझ  के परे है। फिर भी आपकी आज्ञा का पालन  किया। मान्यवर मैं आस्तिक  हूँ। मेरा मानना है कि विश्व में एक  मात्र  धर्म  मानवता है, अन्य सभी सम्प्रदाय  हैं। मेरे धर्म  को मानने वाले लोगों की संख्या बहुत  कम है, अतः आप  मुझे नास्तिक  भी कह सकते हैं। किन्तु  यह सच  है कि मेरे धर्म  को (सॉरी केवल  मेरा  नहीं)  न माने वाले लोग  वास्तव  में नास्तिक  हैं। मैं विज्ञान , ज्ञान और  विचारों के खिलाफ  नही हूँ। संभवतः आप  हैं अतः आप ही इसके  खिलाफ  आवश्य  ही आन्दोलन  चलायें। आप अपने आप ही किसी के प्रति भी यह धारणा बना लेते हैं कि वह क्या सोचता है क्या  कहता है और क्या करना चाहता है। यह एक  अच्छे ज्योतिषी की निशानी है।  विज्ञान  और इंटरनेट के दुरुपयोग  का कारण  बौद्धिक  विकार है, इसके लिये इसके इन्हें नकारने की आवश्यकता नहीं है। मैं न  तो किसी के पीछे पड़ता हूं और न ही किसी के पीछे चलता हूँ। केवल  ज्ञान  की तलाश  में आपके घऱ थोड़ी देर के लिये आ   जाता था। शायद आपको मेरा आना अच्छा नहीं लगता।  यदि मेरी किसी बात  से आपको पीड़ी पहुँची हो तो उसके लिये क्षमा  माँगता तथा चाहता हूँ। धन्यवाद

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय दिनेश जी जितना समय आप मुझसे वाद-विवाद में बर्बाद कर रहे हैं उतने समय में आप कुछ रचनात्मक लेख लिख सकते थे, पर शायद आपमें रचनात्मकता की जगह नकारात्मकता भरी हुई है जिसके कारण आप हर चीज को गलत ढंग से देखने का प्रण ले चुके हैं| मुझे आपकी त्रुटियाँ ढूँढने का कोई शौक नहीं है| इस देश में त्रुटिपूर्ण बहुत कुछ है| ऐसे में आप पर विशेष रूप से ध्यान जाना थोडा मुश्किल है| हमारी राजनीति ही नब्बे प्रतिशत ऐसे लोगों से भरी पड़ी है| (1) "दुनिया में पहले धर्म आया और धर्म ने ही मनुष्यों को मानवता की शिक्षा दी" इस बात को आप काट नहीं सके, और काटते भी कैसे? सत्य को काटना असंभव है| (2) "कुछ स्वार्थी मनुष्यों ने धर्म की आड़ लेकर धर्म को बदनाम किया" इसका भी आपके पास कोई जवाब नहीं है| (3) कुछ समय पहले अखबार में छपी खबर के अनुसार एक हिन्दू लड़के ने अपनी सगी चचेरी बहन के साथ उसकी सहमति से विवाह कर लिया| क़ानून वहां लाचार हो गया क्योंकि दोनों व्यस्क थे| कुछ धर्म इसकी मान्यता देते हैं किन्तु हमारे हिन्दू धर्म के अनुसार भाई-बहन का रिश्ता क्या होता है ये आप अच्छी तरह से जानते हैं| यहाँ स्पष्ट है कि उन दोनों भाई-बहन ने क़ानून का नहीं बल्कि धर्म का उल्लंघन किया| इसपर आपकी निजी राय क्या है? उन्होंने सही किया या गलत? (4) आप नास्तिक हैं और आपकी धर्म में कोई आस्था नहीं परन्तु जनजागरूकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर हिन्दू धर्म और उसके संस्कारों पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां करके हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुँचाने का अधिकार आपको किस क़ानून ने दे दिया जबकि भारत के संविधान में ये स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी जाति, धर्म, भाषा या संप्रदाय की भावना को ठेस पहुँचाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और इसे जनजागरूकता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता| (5) विज्ञान के दुरुपयोग से आज मानव के अस्तित्व को खतरा हो गया है| परमाणु बम, ऐ. के. ४७, टैंक, मिसाइल जैसे विनाश के घातक हथियार विज्ञान की ही देन हैं| आप विज्ञान के खिलाफ आन्दोलन कब से छेडनेवाले हैं? (6) इंटरनेट पर आजकल पोर्न फिल्में आसानी से मिल जाती हैं जो बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव डालती हैं और इससे समाज में यौन हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है और आपकी "मानवता" के लिए भी ये ठीक नहीं| अपना नेट कनेक्शन कब कटवा रहे हैं आप? (7) मोबाइल फोन आतंकवादियों के लिए वरदान बन के आया है| कुछ वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर की सरकार ने मोबाइल के राज्य में उपयोग पर रोक लगा दी थी| दुरुपयोग तो मोबाइल का भी होता है| आप मोबाइल फोन उपयोग तो नहीं ही करते होंगे? क्योकि जिस चीज का दुरुपयोग हो जाता है आप उसके पीछे नहा-धो के पड़ जाते हैं| आपके पास अगर मेरे इन सवालों के सटीक और "तार्किक" जवाब नहीं हैं तो कृपया फिर अपनी पुरानी बकवास लेकर मेरे ब्लॉग पर मत चले आइयेगा|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

आदरणीय  गौरव जी, आपकी सोच पर आश्चर्य   का भाव  उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसमें मेरा दोष  नहीं, आपके विचारों की भूमिका अहम  है। यह बात तो उन भ्रष्टाचारी नेताओं की स्मृत कर देती है, जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कहते हैं कि हम  हर  किसी बात का उत्तर देने के लिये बाध्य नहीं है। धर्म  के नाम  पर  कितनी प्रत्यक्ष  एवं अप्रत्यक्ष  हिेसा हुई, हमें यह धर्म  के नशे कारण  नहीं दिखता। धर्म  की मदिरा सुगंधित  होती है। किसी अन्य गंध  का अहसास  नहीं होता। मेरी नाक  में प्रॉब्लम  एक  व्यंग  है। गलती हो तो इंसान  की, अच्छा हो तो धर्म  का, यह कौन  सा सिद्धांत। तर्क  ही धर्म  है, तर्क  का दुरुपयोग  नहीं हो सकता, तर्क  की आड़ में कुछ  लोग  कुतर्क का प्रयोग  करते हैं। ऐसा उनका अपने लक्ष्य  के प्रति  आस्था का होना होता है।  यह हमारी कमजोरी है कि जो हमें अच्छा लगे वह वही ग्रहण  करते हैं, जो अच्छा है उसे ग्रहण नहीं करते। हम  बुरे को धर्म  के सुन्दर वस्त्र  पहनाकर अच्छा सिद्ध  करने के प्रयास  में लगे रहते हैं। तब और अधिक  आश्चर्य  होता है कि हम  केवल  वह जानना चाहते हैं, जो हमारे मनपसंद हो। सच  क्या है इससे हमारा कोई सरोकार  नहीं होता। मैं उन आलेखों पर जरूर कमेंन्ट देता हुँ, जहाँ मुझे लगता है कि यह  विचार समाज  और देश  के  लिये उचित  नहीं है। और अपनी समझ  के हिसाब  से विनम्रता पूर्वक  अपना पक्ष  रखता हूँ। चाहे वह मेरे ब्लॉग  पर आते हो या नहीं। जितने कमेन्ट  मुझे मिले हैं उससे कई गुना कमेन्ट मैं दूसरे के ब्लॉगों पर कर चुका हूँ। एक  बात साफ  कर दूँ मैं न तो किसी सम्मान  के लिये लिखता हूँ, और न इसलिये कि मुझे लोग ढ़ेर सारी प्रतिक्रियायें दे दे। हाँ यह चाह जरूर है कि लोग  मेरे विचारों को  अधिक  से अधिक  पढ़े। यदि गलत  लगे तो अपने विचारों से अवगत  करायें। मैं चाहता हूँ कि लोग मेरे विचारों में त्रुटियाँ निकालें। मैं आपका हृदय  से प्रसंशक  बन गया क्योंकि आपने मेरी त्रुटियां खोजने का व्रत  लिया। मेरा मानना है कि आपकी आलोनचा करने वाला व्यक्ति आपका अधिक हित  कर सकता है। आप यदि मेरी आलोचना करते रहेंगे तो मैं आपको अपना हितैषी समझता  रहूँगा। कुछ  लोग  तो शब्दों से खेलने के लिये आलोचना  करतें हैं। शब्द शक्ति का दुरुपयोग  करते हैं। मेरा मानना है कि कमेन्ट खुशी का मापदण्ड नहीं हो सकता, कमेन्टस  केवल  हमारा उत्साहवर्धन  कर सकते हैं। हम  मानवों की कमजोरी है कि हम  अपने विचारों के विपरीत कुछ  भी सहन  कर पाते, ऐसी परिस्थितियाँ हमारे अंदर क्रोध  उत्पन्न  कर देती हैं और यही क्रोध   हिंसा का जन्म देता है और  हिंसा ही धर्म  को सम्प्रदाय  बना देती है। भारत मुगलों के आक्रमण का एक  कारण  यह भी था। कठोरता और अशिष्टता में अंतर है आपकी कठोरता का स्वागत है। सत्य  एक  होता है और अपनी जगह पर  टिका रहता है, वह अडिग  रहता है। हम  उसे अपनी  अज्ञानता के कारण  हठी समझ  लेते हैं। असत्य  अनेक  होते हैं अतः वह अपने स्थान पर स्थाई  नहीं होते। जिसे आप  मेरे सिद्धांत  समझ  रहे हैं वह मेरे नहीं हैं, वह तो इसी संसार के हैं, और आज  के नहीं  है। युगों पुराने हैं। जिन्हें पहिले दबा दिया गया था। भाई इस  संसार में मेरा कुछ  नहीं है। सब इसी संसार का है। मैं अपने सिद्धांतों पर आशंकित  नहीं हूँ। हाँ यह जरूर मानता हूँ कि विचार परिवर्तनशील होंते हैं। समय के साथ  इनमें भी बदलाव आ सकता  है। इस  बदलाव को मैं हार जीत से नहीं देखता। लेकिन  मेरे विचार आस्था और झूठ  पर आधारित  नहीं होते हैं। बुद्धि पर आश्रित होते हैं। क्योंकि विचारों का उद्गम  स्थल  मस्तिष्क है न  कि मन  या हृदय। जबकि आस्था का जन्म मन या हृदय मे होता है। जो कि विचार शून्य होता है। आप आपके आलेख  से परेशान  नहीं हूं, अपितु खुश  हूँ कि आपने इस तरह का  आलेख  लिखा है। मुझे भी अपने विचारों को परखने का मौका मिलेगा कि मैं जो सोचता, कहता या लिखता हूँ वह सहीं है या नहीं।  मैं हठी नहीं हूं, अपने विचारों को बदलने में विश्वास  करता हूँ, लेकिन आप हठी है, जो अपने विचारों को बदलने में विश्वास  नहीं करते। मुझे आप पर  किसी तरह का क्रोध  नहीं है, बल्कि एक  विशेष प्रेम  है जो एक  सच्चे निंदक  के प्रति होता है। क्रोध  तो तब आता जब आप मेरी झूठी तारीफ  करते।  मैं आपको सचमुच  अपना मित्र  और  हितैषी समझता हूँ। आप मुझे क्या समझते हैं यह तो आप ही जानते  हैं। यह शब्द मानव  धर्म  के विपरीत  है कि आप सोचते रहिये मुझे उससे कुछ  लेना देना नहीं हैं। इस  तरह के विचार से धर्म  की रक्षा कैसे होगी। मैं तो आपको धर्म  के रक्षक  के रूप  में देख  रहा था। मैं ऐसा कदापि नहीं कहूँगा कि आप सोचते रहिये, मुझे कुछ  लेना देना नहीं हैं। भाई मुझे आप क्या सारे संसार से लेना देना है। हमें इन  मनोविकारों से समाज  को मुक्त करना है यदि हम  ही इन मनोविकारों  से ग्रस्त  हो गये तो यह हमारे मानवता का उपहास  होगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

दिनेश जी बातों को कविता के रूप में तुक मिला-मिला के कह देने से असत्य सत्य नहीं बन जाता| आपने तीन जगहों पर जाकर एक ही बात को दोहराया है अतः मैं तीनों बातों का जवाब यहीं दे रहा हूँ (वैसे देने से कोई फायदा तो हैं नहीं, चलिए फिर भी)| आपने एक जगह लिखा है कि आपको धार्मिक स्थलों से खून की बदबू आती है, इसके साथ आपने एक सही बात भी लिख दी है कि शायद आपकी नाक में ही प्रॉब्लम है| तो दिनेश जी धर्म तो सनातन है और निष्पाप है| उसके नाम पर पाप तो इन्सान करते हैं और ये बात सभी को पता है| तो ये तो कोई बात नहीं हुई कि जिसने किया उसे छोड़ दें और जिसके नाम पर किया उसे पकड़ लें| आपको अगर खून की बदबू आनी चाहिए तो अपनेआप से आनी चाहिए क्योंकि आप भी इन्सान हैं| गलती इन्सान ने ही की है, धर्म ने नहीं| आप एक शब्द को बड़ी प्रमुखता से उपयोग करते है जो है "तार्किक बात"| जरा ठंढे दिमाग से सोचिये इसी तार्किकता का दुरुपयोग आतंकवादी भी करते हैं अपनेआप को सही सिद्ध करने के लिए| अपने डेढ़ हजार कमेंट्स पर खुश मत होइएगा कि उतने लोग आपकी विचारधारा को मान चुके हैं| वो आपको भी सराहते हैं और आपके ठीक विपरीत विचारों को भी, चाहे वो विचार इस मंच पर किसी के भी हों| ये बात तो आप भी जानते ही होंगे| आपकी सोच से दुनिया नहीं चल रही| आप मूर्ति-पूजा को ढोंग बता-बता के चिल्लाते रहते हैं| जाकर अपने "कमेन्ट" देनेवाले सहयोगियों के घरों में देखिये, वहां क्या हो रहा है| क्योंकि सत्य ही यही है| मैं कमेंट्स को लेकर इतना गंभीर नहीं होता| कोई कमेन्ट दे या न दे मुझे कोई मतलब नहीं है| जाकर मेरे कमेंट्स देख लीजिये, मैं वहीँ कमेन्ट देता हूँ जहाँ मुझे मेरी विचारधारा मिलती है| आपके मन में सवाल उठता रहता है कि मैं विपरीत विचारों वाले ब्लॉग पर कमेंट्स क्यों नहीं देता? देखिये परिचर्चा एक आवश्यक तत्व है जीवन का| लेकिन जहाँ जिद हो, उससे परिचर्चा समय की बर्बादी बन जाती है जैसा की आपसे या कुछ और लोगों से| मैं दूसरों को भी ऐसा करने के लिए क्यों कहता हूँ? जब आप अपने विचारों को मानने के लिए सब पर दबाव डालते रहते हैं तो क्या मैं अपनी बात किसी से नहीं कह सकता? और वैसे भी ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं कहता, जो भी व्यक्ति ऐसी स्थिति देखेगा वो यही कहेगा| मेरी गलती तब होती जब मेरे शब्दों में अशिष्टता होती| किसी के लिए आपत्तिजनक व्यक्तिगत टिप्पणी होती| ऐसा कोई आरोप इस मंच का कोई सदस्य मुझ पर नहीं लगा सकता| मैं अपनी बात सीना ठोक के कहता हूँ, मुझे किसी का डर नहीं| आपने कहा कि मैं अपनेआप को सही मान रहा हूँ, यही काम तो आप कर रहे हैं| मुझे किसी के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग उचित नहीं लगता पर आपने मुझे विवश कर रखा है| आपका कहना है कि मेरी सोच में जड़त्व है तो मेरा भी कहना है कि आपको अपने ही सिद्धांतों पर कोई भरोसा नहीं है| आप हमेशा संशय में रहते हैं| मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा कि जब से मेरा ये लेख आया है आप इतने परेशान क्यों हैं? आप अपनी कहें तो बहुत अच्छा, दूसरा कोई अपनी बात कहे तो आप तिलमिलायेंगे| वैसे भी मैंने कोई नयी बात नहीं कही है, वही कहा है जो सत्य है| आप किसी की भी आस्था पर जब चाहे चोट कर देते हैं लेकिन आपकी बातों के विपरीत कोई कुछ कहे तो आपका गुस्सा फूट पड़ता है| यही है आपकी "तार्किक" सोच? और बात करते हैं मेरे गुस्से की| आपने ये भी कहा कि मैं सोचता हूँ कि मैंने जो लिख दिया वो सही है, तो मेरा ये कहना है कि मैं वही लिखता हूँ जो सही होता है| अगर अभी भी आपको शंका है तो अब मैं कुछ नहीं कर सकता| आप जो सोच रहे हैं सोचते रहिये, मुझे उससे कुछ लेना-देना नहीं है|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

आदरणीय  वासुदेव जी, सादर नमस्कार। इसमें मे कोई संदेह नहीं है, आप  एक  विद्वान  पुरूष। आपकी तार्किक  बातों से मेरी पूर्णतः सहमति हैं लेकिन जहाँ आपके लेखन  में आस्था हावी हो जाती है, वहाँ से मेरी असहमति आरंभ  हो जाती है। मैंने किसी बहुत बड़े वैज्ञानिक  के मुँह से बहुत पहले सुना था, नाम तो याद नहीं आ   रहा, संभवतः नोबल  पुरस्कार  विजेता थे। उनका कहना था कि किसी बात को तब तक  स्वीकार या  अस्वीकार मत  करो जब तक  वह  सिद्ध  या असिद्ध  न हो जाय। गौतम  बुद्ध  का कहना भी कुछ  कुछ  ऐसा ही है। उन्होंने अपने  शिष्यों से कहा था कि "मेरी किसी बात  को केवल  इसलिये नहीं  मानना कि वह बुद्ध  ने कही है। बल्कि मनन  चिन्तन  करें। यदि  आपको वह तार्किक  लगे तो उसे स्वीकार करना अन्यथा नहीं। आज  मैं जो कह रहा हूँ हो सकता है वह कल  के लिये उपयुक्त न  हो। यदि आपको ऐसा लगे। तो उसमें निश्चित ही बदलाव कर लेना।" गौतम  बुद्ध  ने कोई धर्म  या सम्प्रदाय  नहीं चलाया था, उन्होंने तो अंधविश्वास  और कर्मकाण्डों का विरोध  किया था। उन्होंने हिन्दु धर्म  की कुरीतियों को नष्ट करने का प्रयास  किया था, हम  कुछ धर्म  को व्यापार की तरह प्रयोग  करने वाले या धर्म  को व्यापार बनाने वाले लोगों ने उनके विचारों को एक  नये सम्प्रदाय  का रूप दे दिया। हिन्दु  धर्म  को पतित  करने में हमारे ही विद्वानों की  साजिश  रही है। ऐसे लोग  धर्म  को अपनी रोजी रोटी का साधन बनाना चाहते थे और वह उसमें कामयाब भी रहे। मंदिरों का निर्माण उसी की एक  कड़ी है। मृत्यु भोज  जैसे कुप्रथा को हम  आज  भी ढो रहे हैं। जाति प्रथा  की उन्मुक्ति के बारे में हम नहीं सोचते। अब तो  दलित  समाज  के नेता भी जाति प्रथा का समर्थन  करने लगें हैं। क्योंकि  इस  आधार पर ही मायावति यूपी की सत्ता पर काबिज  हुईँ थी। आज  भी हम  बेटियों को अपना वारिस  बनाने को तैयार नहीं हैं। अपने धर्म  की दुर्दशा पर हृदय दुखी हो जाता है। और वह दुख  आक्रोश   बन कर कविता का रूप ले लेता है। आप जैसे विद्वान लोग  यदि चाहें तो हमारे धर्म  को इन  कुचक्रो से निकाल  सकते हैं। क्या कारण  थे कि लोगों ने दूसरे धर्म  का ग्रहण  कर  लिया। यदि इसका  कारण  हमारी अहिंसात्मक  प्रवृति रही है तो फिर हमें विचार  करके इस प्रवृति का परित्याग कर देना चाहिये। यदि जाति प्रथा रही है तो इसे भी  तिलांजली देना चाहिये। यदि कर्मकाण्ड रहें हो तो उसका भी परित्याग  करना चाहिये। अब कुछ  करने का वक्त आ गया है। बहुत  देर हो चुकी  है। अब न जागे तो कब जागोगे। 

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

दिनेश जी, धर्म को आप अपने रूप में माने या दूसरा अपने.. परिभाषा से अंतर नहीं पड़ता..!! मेरा मानना है कि उसमे कुछ भी गलत या ढोंग नहीं यदि आपका मानना दुसरे के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता| आप शिक्षित होते गए अतः कर्मकांड आपको पाखंड लगा उससे दूर होते गए... मेरे एक मित्र हैं जोकि पहले कर्मकांड को पाखंड मानते थे बाद में वो वैज्ञानिक बने, DRDO तक में काम किया, वो मुझे कहते हैं जब मैं शिक्षित हुआ तब मुझे पता चला हिन्दू धर्म के कर्मकांड का क्या अर्थ है.! उन्होंने ही मुझे सबसे पहले बताया था कि large हैड्रान कोलाईडर में शिव की तांडव प्रतिमा रखी है, सुना मैंने भी था quantum physics और उसके कुछ वैज्ञानिकों के बारे में.. बाद कुछ गहरे से समझा!! तो ये तो अपनी अपनी सोच समझ है कोई शिक्षित होकर मूर्तीपूजा को बकवास कहने लगता है तो कोई उसकी वैज्ञानिकता के आगे नतमस्तक हो जाता है..!! मेरे एक सर थे जोकि बहुत बड़े वैज्ञानिक रह चुके हैं... कई देशों से उनके रेसेअर्च पेपर publish हुए हैं... वो मुझसे एक बात कहा करते थे जोकि मैंने गांठ बांध ली है कि वैज्ञानिक किसी वस्तु का पूर्ण खंडन मात्र इस आधार पर नहीं करता कि वह सिद्ध नहीं हुआ है इसलिए कर सकता है कि वह सिद्ध हो चूका है| यहाँ ये सब तो प्रसंगबस लिख गया लेकिन लिखना ये चाहता था कि क्या हिन्दू धर्म अलग है और वैदिक सनातन धर्म अलग है जैसा कि आपको लगता है... इस लिकं पर जाईये संभव है कुछ तथ्यगत उत्तर मिले.. आपकी सनातन धर्म की निजी भावनात्मक परिभाषा हो तो और बात है- http://tripathivasudev.jagranjunction.com/2011/08/06/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5/

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

हाँ.....हाँ...हाँ....! धर्म की भी बात करते है आप और फिर गुस्से की भी. आप तो इस अपने गुण से उपरोक्त आलेख में दिए व्यक्तव्य को ही काट दिए. डर................निश्चय ही होता यदि कोई चीज अपनी होती जिसे चोरी होने की आशंका हो, डर तो तब होता जब जब मैं कोई प्रस्ताव किसी के सामने रखता और उसे इंकार हने की शंका होती,डर तो तब होता जब मैं कोई बात स्वार्थ, सम्मान और अज्ञान से वशीभूत होकर रखता ....जो है उसको रखने में क्या डर...?सूरज को सूरज कहने में क्या डर..........? मैं तो बस उसी पर बात किया हूँ जिस पर आप अपना विचार दिए हैं..... अब भी वही कहता हूँ....आप मेरे सवालों के जवाब देना चाहते है तो दीजिये और यदि नहीं देना चाहते तो कोई बात नहीं..........! यह बड़ा-छोटा, डर-निडर, मान-अपमान की बात छोडिये न..................! और आप इस गंभीर मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते तो फिर चलिए आप में और मुझ में हास्य-व्यंग्य ही हो.परन्तु यदि मैं वो भी शुरू कर दिया तो आप उसे गंभीरता से लेंगे और फिर आप अपने दिल में मेरे प्रति एक नफ़रत ले के बैठ जायेंगे जैसा कि तत्काल में कुछ लोग ...............परन्तु मैं हास्य-व्यंग्य को गंभीरता से लेता ही नहीं. वैसे भी वो गंभीरता क्या जो प्यार की जगह पर नफ़रत पैदा करें......................................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

अनिल भाई, मैंने अपने लेख में केवल सत्य को ही रखा है और कुछ नहीं| मैंने उन सभी बातों का जवाब दिया जो आप या दिनेश जी अक्सर इस मंच पर उठाते रहते हैं| लेकिन दिनेश जी फिर वही प्रश्न लेकर आ गए| मैंने फिर भी सोचा कि चलो अगर और कुछ शंका है तो उसका भी समाधान कर दूँ| मैंने उन्हें उचित जवाब भी दिया| लेकिन एक बार फिर दिनेश जी और आप उन्हीं प्रश्नों को नए शब्दों और ढंग में सजा के ले आये| अब बताइए मुझे गुस्सा आएगा या नहीं? आप अपनी दोहराएँ, मैं अपनी दोहराऊँ| यही चलता रहे और धीरे-धीरे फिर एक नया विवाद खड़ा हो जाये, यही चाहते हैं आप? और इस मंच पर इतने दिनों के अनुभव से एक बात मुझे भली-भांति समझ आ गई है कि आपसे और दिनेश जी से बहस का कोई फायदा नहीं है| कोई कुछ भी कह ले, आपदोनो अपनी ही कहेंगे| आपने कहा कि "किसी व्यक्ति को अपनी बात पूरी शक्ति से कहना पड़े तो फिर उसमे सच्चाई का सवाल ही नहीं उठता" तो यहाँ शक्ति मैं लगा रहा हूँ या आप लगा रहे हैं? मैं तो अपनी बात कह के चैन से बैठा हूँ, क्योंकि जानता हूँ कि मैंने जो कहा सच कहा और मुझे उसे साबित करने कि कोई जरूरत नहीं है| आप ही जबरदस्ती अपनी मनवाने पर तुले हैं| शायद डर आपको लग रहा है कि अभी तक आप जो कहते आये उसका भांडा न फूट जाये| अब सोच लीजिये कि डरा हुआ कौन है?

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

सादर प्रणाम रक्ताले सर प्रशंसा के लिए आपका धन्यवाद| धर्म ही मानवता की शिक्षा देता है| धर्म को नकारना अपने अन्दर के मनुष्य को नकारना है| मैंने अपने लेख में मोबाइल और गर्लफ्रेंड का जिक्र आधुनिक(?) मनुष्य की सोच को दर्शाने के लिए किया है| धर्म के विरुद्ध दिए जानेवाले कुतर्कों का आधार ही यही होता है कि धर्म का दुरुपयोग हो रहा है| उनसे मैं यही पूछना चाहता हूँ कि क्या विज्ञानं का और आजकल कि कथित आधुनिक सोच का दुरुपयोग नहीं हो रहा? विज्ञानं के दुरुपयोग से आज पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न हो गए हैं| कथित आधुनिक सोच ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है| उन्हें ये सब दुरुपयोग नजर नहीं आता?

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

अनिल भाई और दिनेश जी अंग्रेजी की एक बहुत ही साधारण और छोटी सी लाइन है "How can you say?"| ये लाइन छोटी जरूर है परन्तु इतनी खतरनाक है कि बड़े से बड़ा तर्कशास्त्री इस एक लाइन के सामने फेल हो जाता है| बताऊँ कैसे? अभी बताता हूँ| वो अपना पूरा तर्क आपके सामने रख देगा लेकिन आप कहेंगे "How can you say?"| वो फिर अपनी पूरी शक्ति से और बातें कहेगा| आप फिर कहेंगे "How can you say?"| वो बेचारा परेशान, फिर दो घंटे भाषण दे देगा| लेकिन आप फिर कहेंगे "How ca....."| अब आपलोग खुद सोचिये कि उसका क्या होगा? जागरण जंक्शन पर इस परमाणु बम लाइन का प्रयोग करते मुझे आपलोग ही दिख रहे हैं| मुझे जो कहना था, मैंने अपने लेख में कह दिया है| मैं उस पर सौ प्रतिशत कायम हूँ| मैं ही क्यों, हर वो आदमी जो निष्पक्षता से सोचता है मेरा समर्थन करेगा और कर रहा है| एक ही प्रश्न को पच्चीस बार घुमा-फिर के पूछना मुझे बिलकुल पसंद नहीं| और हाँ, विवाद पैदा कर के अपने कमेंट्स बढ़ाने का भी मुझे कोई शौक नहीं है|मैंने अपने लेख में कोई विवादास्पद बात नहीं लिखी है| वही लिखा है जो सच है|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

आप  जिसको कह रहे हठधर्मिता हे दोस्त, सच्चाई है वह आप उसको चाह न मानो। आस्तिक  हूँ मैं भी मित्र आपके जितना, आस्तिक  का अर्थ  मित्र  किन्तु पहचानों।। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ गौरव जी धर्म  का जो शाब्दिक  अर्थ  लिया जाता है वह वस्तुतः साम्प्रदाय है। यह सभी धर्म  (सम्प्रदाय) मानवकृत हैं। केवल  एक  मात्र  अपरिवर्तनशील   धर्म  मानवता है। जो आंतरिक  है। हिन्दु, मुस्लिम  सिक्ख  ईसाई आदि तो बाहरी धर्म  हैं, जिन्हें कुछ  क्रियाओं द्वारा बदला जा सकता है। हमें धर्म  का मूल  आशय समझना होगा। जो हमें बताया, सिखाया या पढ़ाया गया है वह  नहीं। हमें शब्दों के मायाजाल  में उलझाकर भ्रमित  किया गया है। जो धर्म रोजगार की तरह  किसी के भरण  पोषण  का साधन  बने, उसमें विकृतियाँ  आना स्वाभाविक  है। धर्म  को धन ने भ्रष्ट  किया है। धर्म  आस्था का नहीं  अपितु बुद्धि एवं सत्य का विषय है। मित्र मैं हठधर्मी नहीं हूँ। मैं पहिले नास्तिक था, कर्मकाण्ड को बहुत मानता था। ज्यों ज्यों शिक्षित  होता गया, विचारों  में परिवर्तन  आता गया। धर्म  के ठेकेदारों ने धर्म  को व्यापारिक  रूप देकर इसे विकृत  कर  दिया है और मूल  धर्म  से हमें वंचित  कर   दिया, इनकी  न  तो धर्म  में आस्था है और न ईश्वर का डर। हमारा धर्म  नास्तिकों के  हाथ  में चला गया और इन्होंने धर्म  की मूल  अर्थ  को ही बदल  दिया। धर्म को शब्दों के जाल  में ऐसा उलझाया की हम  अपना वास्तविक  धर्म  को भूल गये हैं। जो हमें धर्म  बताया जाता है वह बाहरी धर्म  है। हमें अंतरिक  धर्म  से वंचित  किया जाता है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

अरे दिनेश भैया जी, हमारा धर्म सनातन है कि पनातन है....कि क्या है......! कौन सही है और कौन गलत ......//इससे निकलिए ..........सब तो अपनी नज़र में महान ही है तो गलत कौन है.....................सभी राम ही है तो रावन कौन है.............यह हमारा धर्म वह तुम्हारा धर्म......यह कुत्ते का धर्म और वह सूअर का धर्म बस बहुत हो चूका.................! गौरव जी, यह सच है कि सब इंसान ने ही किया है.धर्म ने कुछ नहीं किया है...........! तो यह भी सच है कि अधर्म ने भी कुछ नहीं किया है सब कुछ इंसान ने ही किया है...........! यदि गीता और कुरान कि बाते ठीक से समझ में नहीं आती या फिर सही अर्थों में हम नहीं ले पाते तो. आप से विनम्र निवेदन है कि एक बार उसके पन्नो को बंद करके हकीकत के धरातल की तरफ आखें करिए.............और अभी जो बात मैं कहा हूँ ..उस पर चिंतन और मनन करिए क्योंकि सिर्फ इसे पढ़ लेने से, यह समझ में नहीं आने वाली बात... "यह सच है कि सब इंसान ने ही किया है.धर्म ने कुछ नहीं किया है...........! तो यह भी सच है कि अधर्म ने भी कुछ नहीं किया है सब कुछ इंसान ने ही किया है...........! "

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

दिनेश जी सादर नमस्कार मैं थोडा हतप्रभ हूँ आपके इस तरह से लिखने से क्योंकि आप फिर से वही बातें दोहरा रहे हैं जो आप अभी तक कहते आये हैं और मैंने उन सभी बातों का जवाब अपने लेख में दे दिया है| या तो आपने मेरे लेख को ठीक से समझा नहीं या फिर अपनी हठधर्मिता के कारण आप समझना नहीं चाहते| हाँ एक बात की मैंने चर्चा नहीं की थी वो है नामकरण की तो चलिए सबसे पहले बात सनातन धर्म और हिन्दू धर्म के नाम के कारण उत्पन्न भ्रम की करते हैं| प्राचीनकाल में हिन्दू धर्म को ही सनातन धर्म के नाम से जाना जाता था| सनातन धर्म को ही वैदिक धर्म भी कहा जाता है| कालांतर में सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म को ही हिन्दू धर्म के नाम से जाना गया| आपने जिस मानवता, प्रेम और भाईचारे जैसे गुणों की चर्चा की उसका प्रतिपादन किसने किया था? जैसा की नीचे वासुदेव जी ने लिखा एक समय मनुष्य भी जंगलियों की तरह से जीवन व्यतीत करता था| नंगे बदन रहना, कच्चा मांस खाना, एक-दुसरे को मार के खाना ये सब उस समय की आम बातें थीं| क्या उस स्थिति के मनुष्य को मनुष्य कहा जायेगा? कालचक्र आगे बढ़ा, धरती पर धर्म की स्थापना हुई| एकता, दया, प्रेम, मानवता जैसे गुणों का धर्म के द्वारा विकास हुआ तब जाकर मानव सही अर्थों में मानव बना| मनुष्य ने वो गुण सीखे जो एक मनुष्य में होने चाहिए| लेकिन फिर मनुष्य की खुराफाती बुद्धि ने काम करना शुरू कर दिया| कुछ ऐसे ठेकेदार पनपे जो खुद को हिन्दू धर्म अथवा सनातन धर्म का सर्वेसर्वा समझते थे| इन्हीं लोगों ने धर्म के नाम पर लोगों में संशय पैदा किया| जाति-व्यवस्था जो कभी कर्म आधारित थी उसे जन्म-आधारित बनाया गया| अपने मन से कुछ जातियों को छोटा और कुछ को बड़ा कह दिया गया| जाति के नाम पर अत्याचार भी हुए| इसीके बाद हिन्दू धर्म के लोगों में बिखराव होना शुरू हुआ जिसकी परिणिति विदेशी शासन के रूप में हुई| आज भी ऐसी मानसिकता के लोगों की कमी नहीं है जो हिन्दू धर्म में रहते हुए हिन्दू धर्म को ही बर्बाद कर रहे हैं| धर्म ने कभी भी लोगों को नहीं तोडा| धर्म ने तो हमेशा दिलों को दिलों से जोड़ने का काम किया है| तोड़-फोड़ का काम इन्सान का है जो हर व्यवस्था का दुरुपयोग करना भली-भांति जानता है|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

भाई कुमार गौरव जी, नमस्कार। हमारा धर्म  सनातन है न   कि हिन्दु, हिन्दु तो एक  संस्कृति है। आपने धर्म  की वास्तविक  परिभाषा दी है, जो व्यवहार में नहीं पाई जाती है। आपके द्वारा  परिभाषित  किये गये धर्म  के गुणों को विरले ही कार्यरूप में परिणित  करते हैं। मैं कुपित होता हूँ स्वयं पर आपने मापदंड  पर पूर्णरूप से खरा नहीं उतर पाता हूँ। हम  अपने प्रारंभिक  एवं मूल  रूप  में मनुष्य  ही थे। किन्तु बौद्धिक  विकास  एवं इच्छाओं एवं आवश्तकताओं की अधिकता ने हमें स्वार्थी बना दिया, यहीं से हम पशु बनने की ओर अग्रसर होने लगे। यह मेरा  एक  दृष्टकोण  है, यह पूर्णतः सत्य हो इसमें मुझे संदेह है। सच  कहा जाय  तो षटरिपु ( काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर ) मानव के  स्वाभिक  गुण  हैं। इनसे मुक्ति अर्थात देवताओं की श्रेणी में जाना। किन्तु कोई नहीं जाना चाहता देवताओं की योनी में, कोई नहीं बनना चाहता देवता। इसके विपरीत मनुष्य से पशु बनने पर तुले हुये हैं। एक  दुसरे को सुअर, कुत्ता, गधा, मेढ़क  कहकर हम यही तो साबित  कर रहे हैं। हम जैसे आज  हैं, वैसे कल  भी थे और शायद आगे भी रहेंगे। हम पर  विदेशियों ने हजारों वर्ष  तक  शासन  किया इसका मूल  कारण  क्या था। मानवता के अतिरिक्त और कोई धर्म  नहीं है जो पूर्णतः अपरिवर्तनशील है जो बदल  सके वह धर्म   हो ही नहीं सकता। क्या मानवीय गुणों को बदला जा सकता है, शायद कभी नहीं। जिन्हें हम  धर्म  समझते हैं, वे मानवकृत  सम्प्रदाय  हैं धर्म  नहीं। ईश्वरकृत  धर्म  केवल  मानवता है। जिसे हम  इन  साम्प्रदायों के नशे की वजह से भूल  गये हैं। इन  सम्प्रदायों का नशा इतना हावी हो गया है हमारे ऊपर  कि हम  इससे कोशिश  करने के बाद भी नहीं निकल  सकते। गैलैलियो, आर्कमिडीज, गौतम  बुद्ध, चर्वाक  तथा चाणक्य आदि महापुरुषों ने जब हमें इस  जाल  से निकालने की कोशिश  की तो हमने अपनी कुटिल  चालों से उनका अस्तित्व ही समाप्त कर  दिया। हमारे ईश्वर, खुदा या गोड ने हमें जन्म के साथ  ही हिन्दु, मुसलिम  या ईसाई नहीं बनाया, प्रथम मानव बनाया, हमारे माता पिता जिस  धर्म  के अनुयायी रहे, हम ने वह  धर्म  या सम्प्रदाय  ग्रहण  कर  लिया फिर वे धर्म  ईश्वर  कृत  कैसे हो सकते हैं।  गौरव  जी आपकी सोच  सचमुच  ही बहुत उच्चस्तरीय  है, लेकिन जब वह धार्मिक  रंग  में रंगने लगता है तो थोड़ा भ्रमित  हो जाता हूँ। सत्य ही धर्म  है लेकिन आवश्यक  नहीं है कि धर्म   ही सत्य हो। मंदिर और मूर्तियाँ  केवल  उदर पोषण  का माध्यम  हैं, धर्म  का अंग  नहीं। क्या हम  इतने सामर्थवान हैं कि उसकी मूर्ति बना सकते हैं और जो सर्वत्र  है क्या उसके लिये मंदिर मस्जिद  चर्च  बनाकर हम उसका अपमान  नहीं करते। हम  उच्चवर्ग  के लोगों ने अपने वर्चस्व  के अनवरत  स्थायित्व के लिये जाति प्रथा को जन्म  दिया है। कहाँ गया हमारा समतावादी सिद्धाँत। कितने अत्याचार  किये हमने दलितों पर। हम  गुलाम  क्यों और कैसे बने, केवल  इस  पर  निष्पक्ष  होकर  विचार  करने पर हमें धर्म  या सम्प्रदाय  का असली रूप समझ  मे ं आ   जायगा।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

वासुदेव जी सादर नमस्कार आपने हिन्दू धर्म का जितना अध्ययन किया है उतना तो मैंने नहीं किया परन्तु हाँ, अपने हिन्दू धर्म से मुझे प्रेम है| कोई भी मनुष्य चाहे कितना भी उछल-कूद ले कि वो धर्म को नहीं मानता लेकिन जाने-अनजाने में वो भी धर्म की शिक्षाओं को ही मानता है| जैसे अपनी सगी बहन के साथ उसकी मर्जी से भी शारीरिक सम्बन्ध बनाना पाप है, ये बात तो हर कोई जानता है और मानता भी है| ये बात किस क़ानून की किताब में लिखी है? क़ानून में तो सिर्फ यही लिखा है कि कोई भी व्यस्क लड़का किसी भी व्यस्क लड़की के साथ अगर उसकी मर्जी से यौन सम्बन्ध बनाता है तो ये गैरकानूनी नहीं होगा| वहां रिश्तों का तो कोई जिक्र नहीं है| ये एक नैतिक मामला है और वो धर्म ही है जो इन्सान को सिखाता है कि बहन और भाई के रिश्ते की मर्यादा क्या होती है| अतः धर्म को नकारनेवाले स्वयं ही भ्रम में जीते हैं और दूसरों को भी भ्रमित करते हैं| धर्म को नकारना अपने अन्दर के मनुष्य को नकारना है क्योंकि मनुष्य का धर्म के बिना कम से कम मनुष्यरूप में तो कोई अस्तित्व है ही नहीं|

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

गौरव भाई, बहुत सटीक लेख। इस लेख के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि आपमे वो माद्दा है जो धर्म रक्षा के लिए चाहिए। आजकल एक राग काफी बज रहा है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है, यह पूर्ण सत्य है किन्तु इस फ़ैशन वाली इंसानियत का अर्थ मुझे नहीं समझ आया। इंसान जन्मतः एक पशु है, पशु से भी अधिक भयंकर क्योंकि पशु की नियत सीमा होती है। इंसान का धर्म ही क्या है? आज पश्चिम में पशु-मैथुन तक फ़ैशन बन चुका है..., आप इसे घृणित कहेंगे तो वे आपको orthodox पिछड़ा कहेंगे, वही उनका फ़ैशन है वही धर्म, अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान मे पैदा होते अधिकतर बच्चे काफिरों के कत्ल को ही धर्म मानते हैं, मनुष्य को यदि पशु के बींच छोड़ दिया जाए तो उसके लिए वही इंसानी धर्म बन जाएगा। आखिर यह इंसानियत का धर्म है क्या...?? बड़े ही बुलंद स्वर से यह कहा जाता है कि प्रेम दया ही धर्म है.... यह विचार आया कहाँ से?? जंगलों मे भटकती सभ्यताएं कच्चा मांस खाकर जीती थीं,... दया क्षमा आदि को धर्म के रूप मे मनीषियों ने स्थापित किया, अपने अन्य अनुभव स्थापित किए, वह धर्म बना, उससे शास्त्र बने। किन्तु इंसानियत धर्म के उद्घोषक उसकी घोषणा ऐसे करते हैं जैसे उन्होने ही यह महान आविष्कार किया है, उन ग्रन्थों को, जिनमे बुद्धि विवेक की पराकाष्ठा के गान संरक्षित हैं, गरियाते फिरते हैं। कई परम्पराएँ आज रूढ प्रतीत होती हैं किन्तु किन परिस्थितियों मे हजारों वर्ष पूर्व वे बनी होंगी, उनका स्वरूप क्या रहा होगा, कौन जानता है? यह भारतीय सनातन धर्म ही है जो "इदमित्थं कहि जाइ न सोई" कहता है, सदैव कलानुसारेण अर्थात समय के अनुसार परिवर्तन को स्वीकार करता है। कई बार तो उन बुराइयों के आधार पर धर्म पर आरोप लगते हैं जो वास्तव मे हमे बदनाम करने के लिए ग्रन्थों मे डाले गए, अंग्रेजों ने एक कमिशन बनाकर यह काम किया था जिसके प्रपत्र अभी तक उपलब्ध हैं, आप यह जानते ही होंगे। मैं अभी बाइबल पढ़ रहा था तो मुझे मनुस्मृति आदि मे उपरोक्त कमिशन द्वारा डाले गए प्रक्षेपों का एक बहुत बड़ा क्लू समझ आया जिस पर मैं भविष्य मे काम करूंगा। हिन्दू धर्म स्वर्ग का लालच नहीं देता, किसी मत के विरोध मे विकसित नहीं हुआ अतः मजहब फैलाने का ध्येय यहाँ नहीं है विश्वबंधुत्व ही मूल मंत्र है। दुर्भाग्य से हम इस मानवता मंत्र को राक्षसों के साथ अपना बैठे और गुलामी अत्याचार झेला। आज इतना गड्डमड्ड हो गया है कि दूसरों के पापों को भी भारतीय दर्शन पर लाद दिया जाता है। पहली आवश्यकता यह है कि हम भारतीय धर्म को मौलिक रूप मे समझें। इंसानियत धर्म से आती है धर्म इंसानियत से नहीं क्योंकि इंसान जन्मजात पशु ही होता है।आजकल जिसको जो समझ नहीं आया वही अंधविश्वास.... मूर्तिपूजा नहीं समझ आई तो अंधविश्वास, मंदिर अंधविश्वास,... आदि आदि। और फिर यह भी बताते हैं कि यह मूल हिन्दू धर्म मे नहीं था, बाद मे आया वेद मे नहीं है भले ही वेद की शाखाओं की कभी सूरत भी न देखी हो। मैं कई स्थानों से जुड़ा रहा अतः बहुत सारे भ्रम देख चुका हूँ। अंत मे- मेरे अनुसार वही धर्म श्रेष्ठ है जो केवल अपने सही होने का दावा न ठोंकता हो और प्रार्थना पद्धति के आधार पर मनुष्य को ऊंच नीच परिभाषित न करता हो।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

गौरव जी नमस्कार , बहुत ही सारगर्भित आलेख .. आपसे सहमत हूँ ..जनसँख्या नियंत्रण और बेरोजगारी उन्मूलन दोनों बहुत जरुरी है और एक दसरे के पूरी तरह से सम्बन्धित भी ..... बेरोजगारी भत्ता से सिर्फ अराजकता ही आएँगी ... बेरोजगार तो बेरोजगार ही रहेगा .... लोग उस भत्ते का भी बंदर बात करेंगे .... और भ्रटाचार का एक और चेहरा सामने आएगा .... विदेशो में बेरोजगारी भत्ते की वजह से नशा खोडी बढ़ी है और लोगो में अध्यन अध्यापन से रूचि घटी है .... जिससे उन्हें बाहर के skilled लोगो को उन्हें लेना पड़ता है ..... बेरोजगार तो बेरोजगार ही रहेंगे बल्कि उन्हें ताने तो और सुनने पड़ेगे .... स्व रोजगार की ट्रेनिंग देना ज्यादा हितकर औए समुचित है ..... भत्ता निदान नहीं अभिशाप है ..

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

आदरणीय विजय जी, सादर.... भाई गौरव जी....प्रणाम बे-रोजगारी की गूँज उन बहरों तक कैसे पहुंचेगी...उनको बड़ी-बड़ी तेल कंपनियों के शोर से फुर्सत तो मिले, उन बेचारों को तो (जेबें भरने के इलावा) इतनी भी फुर्सत नहीं कि राष्ट्रपिता के खून से सनी मिट्टी नीलाम हो रही है...कम से कम वहां तो देश की मिट्टी पलीत होने से बचा लेते.......किसान अपना गेंहू लेकर मंडियों में धक्के खा रहा है...इनके पास बोरियां नहीं हैं, ताकि गेंहूँ को संभाल सकें...सारा बारदाना पाकिस्तान को एक्सपोर्ट कर दिया बेचारों ने.....नहीं तो उनका गेहूं खराब हो रहा था....अब किस-किस की आवाज़ सुनेंगे बेचारे....विजय जी.....आप उनपर इलज़ाम न लगायें......फिर भी देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्री हैं....जब से बैठे हैं........देश में अमीर और अमीर और गरीब और गरीब हो तो रहा है.....अब इस से ज्यादा ये क्या करें......बेचारे...... मनमोहन सिंह 'झल्लू'......... प्रणाम......

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

सादर प्रणाम रक्ताले जी प्रशंसा के लिए धन्यवाद. जहाँ तक मेरी बात है तो मैं सबसे पहले भगवान को मानता हूँ. आपने बात की निर्मल बाबा की तो इस मंच के माध्यम से मैं आपसे कहना चाह्हता हूँ की मैं निजी रूप से निर्मल बाबा का चेला नहीं हूँ. मैं सिर्फ उस विचारधारा के खिलाफ हूँ जिसमें किसी व्यक्ति विशेष को अचानक से सिर पर बैठा लिया जाता है और अचानक से नीचे उतार दिया जाता है. इसके अलावा एक बाबा के नाम को सहारा बना के पूरे संत समाज को कलंकित करने का दुष्प्रयास नहीं किया जाना चाहिए ऐसी भी मेरी सोच है. अन्धविश्वास की तरफदारी मैंने कभी नहीं की और न ही मेरी ये 'माँ दुर्गा आराधना' किसी बाबा के लिए समर्थन जुटा रही है. आपने मुझे निर्मल बाबा का एजेंट ही समझ लिया. मेरी भगवान में आस्था है इसलिए ऐसी रचनायें लिखता हूँ. और रहा सवाल भक्तों को नमस्कार करने का तो आपको बताना चाहता हूँ की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों के कारण मेरे पास समयाभाव रहता है जिसके चलते रोज इस मंच से जुड़ना संभव नहीं हो पता. जिस दिन समय मिलता है उस दिन ज्यादा से ज्यादा लोगों के ब्लॉग पर जाके उनके विचारों को जानने का प्रयत्न करता हूँ. ये भी कोशिश रहती है की जिनके लेख मुझे अच्छे लगे उन्हें अपने ब्लॉग पर आमंत्रित करूँ जिससे उनके द्वारा प्रोत्साहन/परामर्श पा सकूँ. आपको अपने ब्लॉग से जोड़ने के पीछे भी मेरा यही उद्देश्य है. जितने विवेकीजन यहाँ आयेंगे ज्ञानगंगा उतनी ही प्रवाहमय होगी. आशा है मेरे उत्तर से आप संतुष्ट हुए होंगे.

के द्वारा: कुमार गौरव कुमार गौरव

के द्वारा: shaktisingh shaktisingh

कुमार गौरव जी! बहुत सुन्दर लेख, मुझे यहाँ पर कुमार विश्वास जी की ये पंक्तियाँ याद आती हैं- "कुछ देश भक्ति के मंत्र यहाँ हमने आकर बांचे तो हैं. हम अनाचार के विषधर के फन पर चढ़ कर नाचे तो हैं, भ्रष्टाचार के अंधड़ को आगे बढ़ ललकारा तो है, धीमा ही सही तमाचा पर उसके मुंह पर मारा तो है." आपने प्रदीप कुशवाहा जी के रिप्ले में लिखा की अन्ना जैसे १० लोग भी इस देश में हों तो भ्रष्टाचार का नाम इस देश से मिट जायेगा. मैं तो कहूँगा की अकेले अन्ना जी ने ही बहुत कुछ कर दिया है, और ये दस लोग अन्ना जी के शिष्य बनकर एक दिन दुनियां के सामने आयेंगे, फिलहाल इतना जरूर कहूँगा कि- "तेरी दीवार तेरी छत भी हिला सकता है, जिद पे आ जाये तो पर्वत भी हिला सकता है, ये सियासत तुने कभी सोंचा न होगा, एक इंसान हुकूमत भी हिला सकता है. "

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

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के द्वारा: Kumar Gaurav Kumar Gaurav

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के द्वारा: Sumit Sumit

आदरणीय योगी जी सादर प्रणाम आपने जो कहा, सही कहा. हम इस देश के निवासी हैं और इस देश से प्यार करते हैं. हमारी सोच अलग हो सकती है किन्तु इच्छाएं नहीं. हम सब अपने देश की उन्नति चाहते हैं. इतिहास गवाह है जब-जब युवा आगे आया है क्रांति हुई है. जब-जब युवाओं ने अन्याय का प्रतिकार शुरू किया है अन्याय का खात्मा हुआ है. महात्मा गाँधी जिन्होंने युवावस्था में अंग्रेजों के जुल्मों को देखा और उसके खिलाफ आन्दोलन शुरू किया, आगे क्या हुआ हर कोई जनता है. सुभाष चन्द्र बोस, भीमराव अम्बेडकर जैसे नेताओं ने अपनी युवावस्था को खेलने की चीज नहीं बनाया बल्कि उस समय की सामाजिक और वैश्विक चुनौतियों के सामने खड़े होकर एक नए युग की शुरुआत की. स्वामी विवेकानंद ही वो युवा थे जिन्होंने पूरे विश्व को हिन्दू धर्म और हिन्दू दर्शन के महत्व से परिचित कराया था. युवा वर्ग एक ऊर्जा से लबरेज रहता है. वो ऊर्जा जिसकी आज इस देश और इस समाज को जरूरत है . आशा है मेरे उत्तर से आप संतुष्ट हुए होंगे.

के द्वारा: Kumar Gaurav Kumar Gaurav

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के द्वारा: kg70 kg70




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