शंखनाद

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ऑस्ट्रेलिया से सीखिए.....

Posted On: 26 Mar, 2015 sports mail में

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जैसे कयास लगाये जा रहे थे परिणाम भी बिल्कुल वैसे ही आए। भारतीय क्रिकेट टीम को कंगारुओं के विरुद्ध विश्वकप २०१५ के सेमीफाइनल मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा। उद्देश्य असफलता मिलते के साथ गरियाने लगने का नहीं है बल्कि ये सोचने का है कि ऐसा क्यों होता है? क्यों हमारी क्रिकेट टीम अपनी निरंतरता को कायम नहीं रख पाती? आज एक चैंपियन की झलक मिलती है तो अगले ही दिन एक बेहद साधारण दर्जे की टीम का दीदार हो जाता है। बीसीसीआई दुनिया के सर्वाधिक अमीर खेल संघों मे गिनी जाती है। अरबों रुपये का कारोबार होता है। बावजूद इन सबके हम आजतक ऑस्ट्रेलिया क्यों नहीं बने? इसके कुछ कारण हैं।

हमारी क्रिकेट टीम में ज्यादातर व्यक्तिकेंद्रित भावना होती है। जैसे सचिन तेंदुलकर मैच विनर हैं तो वो ही सबकुछ करेंगे बाकियों की कोई जिम्मेदारी नहीं। वो गये तो बाकी भी तू चल मैं आया कि तर्जपर आने-जाने लगेंगे। आजकल अगर कोहली जल्दी आउट हो जायें तो ज्यादातर मौकोंपर मध्यक्रम बिखर जाता है। हमारी १९८३ की टीम में कोई स्टार नहीं था (सारे विश्वकप जीतने के बाद स्टार कहलाने लगे थे वर्ना उस समय आज के बांगलादेश से ज्यादा औकात नहीं थी हमारी क्रिकेट में) लेकिन सारे अपना काम करना जानते थे। वो एक संपूर्ण “टीम” थी। परिणाम आपके सामने है। वो ही भावना २०११ में दिखी। परिणाम तब भी वही हुआ लेकिन जब-जब एक-दो खिलाड़ी ही संकटमोचक बन जाते हैं तो समस्या खड़ी हो जाती है। १-२ आपके लिए हमेशा जीत नहीं लाएँगे।

दूसरा कारण, खिलाड़ियों को जरूरत से ज्यादा दिया जाता है। ऐसा मैं नहीं मीडिया के सूत्र ही कहते हैं। जब सारी जिंदगी की कमाई कुछ सालों में मिल जाएगी तो जाहिर सी बात है आगे के लिए भूख खत्म या कम हो जाएगी। एक विश्वकप लाने का जो पैसा है उससे चार गुना ज्यादा तो क्रिकेटर साबुन का विज्ञापन कर कमा लेते हैं। वो ध्यान अपना क्रिकेट पर क्यों लगाएँ?? याद है वो दौर जब इसी तरह के एक विवाद में हमारे क्रिकेटरों ने बीसीसीआई तक को आँखें दिखा दी थी।

इसके अलावा हमारी भारतीय मानसिकता भी कम दोषी नहीं है। खेल भावना के नामपर रीढ़विहीन बातें, आपसी संबंध, राजनीति वगैरह-वगैरह इस तरह हावी रहती है कि इनमें पिसकर जीतने की इच्छा दोयम दर्जे की हो जाती है। २००७ में भारतीय टीम के बेहद शर्मनाक प्रदर्शन के बाद जब राहुल द्रविड़ को टीम से हटाने की बात हुई तो किस तरह से सुब्रमण्यम स्वामी ने उनके पक्ष में राजनीतिक बयान दिए थे किसी से छिपा नहीं। सौरव गांगुली को हटाये जानेपर बंगाल में बवाल होना तो आमबात थी। वीरेंद्र सहवाग के जाट होने के कारण भी कुछ नेताओं ने उनमें रुचि दिखाई थी। इसके अलावा कश्मीर के आतंकवाद का आरोप झेल रहे एक क्रिकेटर को इसी राजनीति ने राष्ट्रीय टीम में मौका दिलवाया था जिसे न खिलाने को लेकर उमर अबदुल्ला ने खासी नाराजगी जताई थी। क्षेत्रवादी सोच भी बीच-बीच में सर उठाती रहती है सो अलग।

क्रिकेट अब यहाँ क्रिकेट न होकर एक व्यवसाय का रूप ले चुका है। आईपीएल जैसे टूर्नामेंट इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। ऐसे में अगर खिलाड़ी अचानक से लापरवाह हो जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं। याद रखिए अगर हमेशा जीतना है तो उसके लिए चार मैच हारकर एक जीतपर बल्लियों उछलनेवाले निजी न्यूज चैनलों की मानसिकता छोड़नी होगी। ऑस्ट्रेलिया से कब कुछ सीख लेंगे हमलोग?

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