शंखनाद

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

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ग़ज़ल - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है

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कोई पगड़ी कुचलता तो कोई आँखें दिखाता है।
सहन करने लगे हम तो हमें जग आजमाता है।
सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का,
शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है।
भरा होता तपा लोहा जहाँ के नौजवानों में,
शहर वो ही भला कैसे ठगा सा दीख जाता है।
जरा सी बात क्या कर दी वतन की लाज की खातिर,
जमाना कोसता मुझको, बड़ा जालिम बताता है।
मुझे तो प्यार है मेरे उसी प्राचीन भारत से,
जो वेदों की ऋचाएं पढ़के औरों को पढ़ाता है।
अदा माशूक की थोड़ी नहीं भाती कभी दिल को,
हमेशा लहलहाते खेतों का दर्शन सुहाता है।
बड़ा ही गर्व होता है सदा उस क्षण को “गौरव” जब,
तिरंगे को नमन करने विदेशी सिर झुकाता है।
कोई पगड़ी कुचलता तो कोई आँखें दिखाता है।
सहन करने लगे हम तो हमें जग आजमाता है।
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सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का,
शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है।
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भरा होता तपा लोहा जहाँ के नौजवानों में,
शहर वो ही भला कैसे ठगा सा दीख जाता है।
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जरा सी बात क्या कर दी वतन की लाज की खातिर,
जमाना कोसता मुझको, बड़ा जालिम बताता है।
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मुझे तो प्यार है मेरे उसी प्राचीन भारत से,
जो वेदों की ऋचाएं पढ़के औरों को पढ़ाता है।
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अदा माशूक की थोड़ी नहीं भाती कभी दिल को,
हमेशा लहलहाते खेतों का दर्शन सुहाता है।
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बड़ा ही गर्व होता है सदा उस क्षण को “गौरव” जब,
तिरंगे को नमन करने विदेशी सिर झुकाता है।


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 13, 2013

बड़ा ही गर्व होता है सदा उस क्षण को “गौरव” जब, तिरंगे को नमन करने विदेशी सिर झुकाता है। वन्दे मातरम सस्नेह बधाई, भाव व रचना हेतु.

shashi bhushan के द्वारा
May 11, 2013

आदरणीय गौरव जी, सादर ! “”सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का, शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है।”" अब शिवाजी का ज़माना कहाँ रहा, अब तो बस “गांधियों” की ही तूती बोल रही है ! बहुत सुन्दर ओज भरी प्रवाहमय रचना ! बधाई !


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