शंखनाद

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

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जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ

Posted On: 21 Jan, 2013 Others,लोकल टिकेट में

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जन्म लिया है मानव का तो, मानवता भी दिखलाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥
.
भोलेपन से विचरण करते, जीवों को खा जाते हो।
बिन माँगे ही चंडालों की, पदवी भी पा जाते हो॥
थोड़ा सा तो सोचो पहले, बिन सोचे न तन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥
.
क्या कोई अनुताप नहीं है, दर्दभरी चित्कारों का।
या जीवन अधिकार नहीं है, उन बेबस लाचारों का॥
होते हो तुम कौन बड़े जो, रक्त से उनके सन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥
.
अंतर के नैनों से देखो, प्यार बड़ा ही आयेगा।
निश्छल उन प्राणों का मुखड़ा, अंदर तक छू जायेगा॥
पाप छाँटनेवाली छलनी से दिन रहते छन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥
.
फिरते बुद्धिमान बने भई, ये कैसी नादानी है।
फर्क नहीं आता है करना, कौन खून या पानी है॥
जाना है दुनिया से लेकर सत्कर्मों के धन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
January 23, 2013

आदरणीय गौरव जी सादर, सुन्दर सद्मार्ग पर आने की प्रेरणा देती इस रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

yogi sarswat के द्वारा
January 23, 2013

भोलेपन से विचरण करते, जीवों को खा जाते हो। बिन माँगे ही चंडालों की, पदवी भी पा जाते हो॥ थोड़ा सा तो सोचो पहले, बिन सोचे न तन जाओ। जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥ असल में इंसान को कैसे भी शक्ति चाहिए होती है और वो इसी भ्रम में दूसरे जीवों को काट के खा जाता है ! सुन्दर सन्देश मित्रवर कुमार गौरव जी !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
January 23, 2013

विचारणीय

shashibhushan1959 के द्वारा
January 22, 2013

आदरणीय गौरव जी, सादर ! बहुत सुन्दर, संदेशप्रद और प्रवाहमय रचना ! “”भोलेपन से विचरण करते, जीवों को खा जाते हो। बिन माँगे ही चंडालों की, पदवी भी पा जाते हो॥ थोड़ा सा तो सोचो पहले, बिन सोचे मत तन जाओ। जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥”" बेहद शानदार रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएं !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 21, 2013

फिरते बुद्धिमान बने भई, ये कैसी नादानी है। फर्क नहीं आता है करना, कौन खून या पानी है॥ जाना है दुनिया से लेकर सत्कर्मों के धन जाओ। जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥ प्रिय कुमार जी सस्नेह सार्थक सन्देश बधाई


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