शंखनाद

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

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तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

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हिम्मत से घर में घुस कर के, रिपुओं ने घोंपे शर-शूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥
.
जितना चाहा लूट गये वो, धन-दौलत संगे सम्मान।
पुरखों को भी न छोड़ा जो, पाते थे जग से गुणगान॥
दुस्साहस तो देखो तिसपे, नर्तन में सब थे मशगूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥
.
बल के मद में चूर सभी थे, चाहे था उनका अभिमान।
वीरों की पहचान वही है, लड़ जाते जो ले के आन॥
देखो तो अपने दर्पण को, जमा गये हैं मोटी धूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥
.
जंग लगा दी भालों में भी, याद नहीं बरछी-करवाल।
रणवीरों के पूत बताना, हुआ भला क्यों ऐसा हाल॥
जो कल तक थे डरते अब वो, कहते भय सारा निर्मूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
January 18, 2013

मान्यवर गौरव जी, सादर ! “बेशर्मी से घर में घुस कर, रिपुओं ने घोंपे शर-शूल। तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल !”" . लाजवाब ! बेहतरीन !! बहुत सुन्दर एवं सशक्त रचना ! . “जितना चाहा लूट ले गये, धन-दौलत, ताकत, सम्मान। छोड़ न पाये पुरखों को जो, पाते थे जग से गुणगान॥ दुस्साहस तो देखो तिसपे, नर्तन में सब थे मशगूल। तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥”" एक मूक प्रश्न ? जो सम्पूर्ण देश की फिजाँ में गूँज रहा है ! हार्दिक शुभकामनाएं !

yogi sarswat के द्वारा
January 18, 2013

बल के मद में चूर सभी थे, चाहे था उनका अभिमान। वीरों की पहचान वही है, लड़ जाते जो ले के आन॥ देखो तो अपने दर्पण को, जमा गये हैं मोटी धूल। तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल बेहतरीन शब्द मित्रवर कुमार गौरव जी ! सुन्दर जोश जगाती रचना !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 17, 2013

भूले नही बस आज्ञा की बारी है हारे सदा वो जीत हमारी है शानदार रचना हेतु बधाई स्नेही श्री

akraktale के द्वारा
January 17, 2013

आदरणीय गौरव जी सादर, सुन्दर जोश जगाती रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2013

आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, देश के जवानों की सुस्त पड़ती बलि-पंथी भावना को जोर देती सुन्दर छंद कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    January 21, 2013

    आदरणीय संतलाल सर, आपने मेरा नाम गलत लिख दिया है. वैसे आपको कविता पसंद आई, जानकर बहुत अच्छा लगा. आपका हार्दिक आभार.


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