शंखनाद

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

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खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी

Posted On: 5 Nov, 2012 में

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छिड़ चुका समर है, बज चुकी रणभेरी|
खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||
.
सामने खड़ी तुम्हारे, शत्रुओं की सेना|
आतुर है द्वंद को, लक्ष्य मात्र प्राण लेना||
सुसज्जित है घाती, घातक शस्त्रों से|
निपुण छल में छिपा, भ्रामक वस्त्रों में||
आना न धोखे में, सुनो बात मेरी|
खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||
.
अस्त्रों की तुमको भी, नहीं कोई न्यूनता|
प्राणोत्सर्ग करनेवालों, की है बहुलता||
ध्वंसी हो तुम भी, ध्वंस करो उनका|
नाश करो खोखला, करनेवाले घुन का||
आएगी सुबह अवश्य, बीतेगी रात अँधेरी|
खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||
.
बजती जब दुन्दुभी, ढोल और नगाड़े|
फड़क उठते युद्धकों के, अंग-अंग सारे||
वीरगति वीरों का, सच्चा सम्मान है|
द्रुतगति, प्रचंड तेज, उनका अभिमान है||
दिखाओ पराक्रम, विजय हो तेरी|
खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||
.
मन में हो विश्वास, ह्रदय में कामना|
दम नहीं शत्रुओं में, कर लेंगे सामना||
अपने मिथ्या दंभ, से जाग जायेंगे|
पीठ दिखा रण में, यत्र-तत्र भाग जायेंगे||
बढ़ो इसी भाव से, जैसे काली घटा घनेरी|
खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
November 11, 2012

आदरणीय गौरव जी, सादर ! ललकार, जोश और उत्साह भरती रचना ! अत्याचार के विरुद्ध युद्ध ! जो कि अब आवश्यक हो गया है ! हो रहा है ! एक अच्छी रचना !

yogi sarswat के द्वारा
November 8, 2012

अस्त्रों की तुमको भी, नहीं कोई न्यूनता| प्राणोत्सर्ग करनेवालों, की है बहुलता|| ध्वंसी हो तुम भी, ध्वंस करो उनका| नाश करो खोखला, करनेवाले घुन का|| आएगी सुबह अवश्य, बीतेगी रात अँधेरी| खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी|| सुन्दर आह्वाहन श्री कुमार गौरव जी ! ऐसे शब्द ही एक दिन परिवर्तन के कारक बनके उभरेंगे !

jlsingh के द्वारा
November 8, 2012

पहाड़ तक भी कांपने लगे तेरे जूनून से … तू आसमां में लिख दे इन्किलाब अपने खून से! प्रिय कुमार गौरव जी, बहुत बहुत बधाई!

rekhafbd के द्वारा
November 7, 2012

गौरव जी दिखाओ पराक्रम, विजय हो तेरी| खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||,जोशीली रचना पर हार्दिक बधाई

Santlal Karun के द्वारा
November 7, 2012

जनाक्रोश और जनतंत्र की उत्तेजना का धैर्य खोता स्वराघाती गीत, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “मन में हो विश्वास, ह्रदय में कामना| दम नहीं शत्रुओं में, कर लेंगे सामना|| अपने मिथ्या दंभ, से जाग जायेंगे| पीठ दिखा रण में, यत्र-तत्र भाग जायेंगे|| बढ़ो इसी भाव से, जैसे काली घटा घनेरी| खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी||”

akraktale के द्वारा
November 6, 2012

आदरणीय गौरव जी                       सादर, आपकी इस रचना पर मेरे द्वारा दी गयी प्रतिक्रया नहीं दिख रही है पुनः एक बार आपको वीर रस से भरी इस रचना कल लिए बधाई. 

    November 7, 2012

    आदरणीय रक्ताले सर सादर प्रणाम संभवतः तकनीकी कारणों से ऐसा हुआ होगा……आपने दुबारा प्रयास करके अपना स्नेह प्रतिक्रिया के रूप में दिया…..आपका दिल से आभार……

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 5, 2012

मन में हो विश्वास, ह्रदय में कामना| दम नहीं शत्रुओं में, कर लेंगे सामना|| अपने मिथ्या दंभ, से जाग जायेंगे| पीठ दिखा रण में, यत्र-तत्र भाग जायेंगे|| बढ़ो इसी भाव से, जैसे काली घटा घनेरी| खींच लो प्रत्यंचा, वीरों करो न देरी| chal chal re naujavan. badhai aese giit hetu. priya kumar ji, sasneh. bharat mitr maen bhi post karen. jay bharat.

    November 7, 2012

    आदरणीय कुशवाहा सर सादर प्रणाम प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद…..आपके कहे अनुसार रचना को भारतमित्र में पोस्ट कर दिया है….


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