शंखनाद

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

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चन्द्रमा

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चन्द्रमा लुभाता है
नयनों को,
देता है शीतलता
मन-अंतर-आत्मा को,
करता है दूर
थकान दिन भर की,
मिलती है शांति
इसकी छत्रछाया में,
मिलता है सुअवसर
कुछ विचारने का,
मनन करने का,
अगले दिन के लिए ;
चन्द्रमा साक्षी है
सम्पूर्ण घटनाओं का,
करता है सचेत
गलतियों का दोहराव न हो,
सत्कार्यों का विराम न हो,
इसका निर्मल प्रकाश
कहता है हमसे,
शिक्षा लो अपनी भूलों से,
प्रेरित हो पुण्यकर्मों से,
संकल्प ले लो
एक नए युग के आरम्भ का |

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
August 15, 2012

कुमार गौरव जी ,.सादर नमस्ते गलतियों का दोहराव न हो, सत्कार्यों का विराम न हो, इसका निर्मल प्रकाश कहता है हमसे, शिक्षा लो अपनी भूलों से, प्रेरित हो पुण्यकर्मों से, संकल्प ले लो एक नए युग के आरम्भ का |……. अत्यंत प्रेरणास्पद रचना के लिए ह्रदय से आभार ,..सादर

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 14, 2012

प्रिय कुमार जी, सस्नेह बहुत सुन्दर भाव, एवं रचना. बधाई.

Chandan rai के द्वारा
August 14, 2012

gaurav जी , चन्द्रमा साक्षी है सम्पूर्ण घटनाओं का, करता है सचेत गलतियों का दोहराव न हो, सत्कार्यों का विराम न हो, बहुत सुन्दर रचना !ो

vikramjitsingh के द्वारा
August 13, 2012

सुन्दर प्रस्तुति….गौरव जी…..

shashibhushan1959 के द्वारा
August 12, 2012

आदरणीय गौरव जी, सादर ! “”इसका निर्मल प्रकाश कहता है हमसे, शिक्षा लो अपनी भूलों से, प्रेरित हो पुण्यकर्मों से, संकल्प ले लो एक नए युग के आरम्भ का |”" बहुत सुन्दर संदेशप्रद रचना ! हार्दिक बधाई !

akraktale के द्वारा
August 12, 2012

गौरव जी               सादर, इसका निर्मल प्रकाश कहता है हमसे, शिक्षा लो अपनी भूलों से, प्रेरित हो पुण्यकर्मों से, संकल्प ले लो एक नए युग के आरम्भ का | सुन्दर विचारों को प्रस्तुत करती रचना. किन्तु भैया इन बादलों ने तो चाँद का निकालना ही दूभर कर रखा है. बधाई.


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